घमंडी हाथी और चींटी – बल का घमंड मत करो

जंगल में एक हाथी रहता था। वह विशाल और बहुत घमंडी था। उसे लगता था कि वह जंगल का सबसे ताक़तवर प्राणी हैं। जंगल में उसका कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जंगल के अन्य जानवरो को अपने आगे कुछ भी नहीं समझता था। सभी छोटे-बड़े जानवरों को परेशान करता रहता था। जब उसका मन करता किसी को दौड़ा लेता, किसी को हवा में उछाल देता, किसी को मार देता, किसी का घर तोड़ देता और सभी जानवरों से अपने शरीर की मालिश करवाता था। सभी जानवर उससे बेहद परेशान थे।

घमंडी हाथी और चींटी की कहानी

एक दिन वह मतवाली चाल में जंगल में घूम रहा था। उसे पेड़ पर बैठा एक तोता दिखाई दिया। हाथी तोते से बोला अरे ओ तोते तुझे दिखाई नहीं देता कौन आया है? मैं इस जंगल का सबसे विशाल और ताक़तवर जानवर हूँ। चल सिर झुका कर मुझे सलाम कर। तोता भी हठी था, बोला मैं क्यों तुम्हें सलाम करूं? मैं सलाम नहीं करूँगा, जो करना हो कर लो।

इतना सुनकर हाथी आग बबूला हो उठा और तोते से बोला रुक तुझे बताता हूँ मैं क्या कर सकता हूँ। हाथी ने पेड़ को अपने सूंड में लपेटा और उखाड़ फेंका। तोते से ग़ुस्से में बोला देख मैंने इस पेड़ को अपने सूंड से ही उखाड़ दिया अब तु इस पर कभी नहीं बैठा पाएगा। जा यहाँ से मेरी नज़रों से दूर हो जा नहीं तो तुझे भी सूंड में लपेटकर आसमान की सैर करा दूँगा। मेरे सामने तुम सब कुछ नहीं हो। बेचारा तोता डर के मारे वहाँ से उड़ गया।

हाथी रोज़ नदी के किनारे पानी पीने जाता था। वहीं नदी के किनारे एक छोटी सी गुफा थी। जिसमें एक छोटी चींटी रहती थी। जो रोज़ अपनी गुफा में खाने का सामान इकट्ठा करती थी। और हाथी रोज़ उसे परेशान किया करता था। कभी उसके रास्ते में कंकड़-पत्थर रख देता, कभी उसको फूक कर उड़ा देता था। उस दिन भी चीटी लड्डू लेकर जा रही थी। हाथी ने चीटी से पूछा अरे चींटी क्या कर रही हो? कहाँ जा रही हो? चीटी ने जवाब दिया कि, मैं लड्डू लेकर गुफा में रखने जा रही हूँ।

बरसात का मौसम आने वाला है इसलिए तीन महीने का राशन इकट्ठा कर रही हूँ। बारिश शुरू हो जाएगी तब मैं पानी में अपने खाने की चीज़ें नहीं रख सकतीं। कभी तेज पानी आ गया तो मैं पानी में बह भी सकती हूँ। इसलिए मैं अपने खाने का बंदोबस्त पहले ही कर रही हूँ। ताकि बारिश में मुझे बाहर न निकलना पड़े। चींटी की बात सुनकर हाथी हँसने लगा। और नदी से सूंड में पानी भरकर चींटी के ऊपर तेज़ी से गिरा दिया।

जिससे चींटी का लड्डू टूट गया। और वह पूरी तरह भींग गई। हाथी ठहाके मारकर हँसने लगा। चींटी को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने हाथी से कहा तुझे बहुत घमंड है न अपनी ताक़त का तुझे एक दिन ज़रूर सबक़ सिखाऊँगी। हाथी बोला तू मुझे क्या सबक़ सिखाएगी छोटी सी चींटी तेरी औक़ात ही क्या है? जा चली जा यहाँ से वरना तुझे अभी अपने पैरों से कुचल दूँगा। चींटी हाथी की बात सुनकर वहाँ से चली गई और मन ही मन उसे बदला लेने का उपाय सोचने लगी।

अगले दिन चींटी अपनी गुफा से निकली और खाना लेने जा रही थी। तभी उसकी नज़र सोते हुए हाथी पर पड़ी। हाथी आराम से गहरी नींद में सो रहा था। उसे देख चींटी के दिमाग़ की घंटी बजी और उसे हाथी से बदला लेने का उपाय भी सूझा। धीरे-धीरे चीटी हाथी के पास गई। और उसके सूंड में घुस गई। और अंदर ही हाथी को काटने लगी। हाथी को बहुत तेज दर्द हुआ। उसकी नींद खुली और वह तेज़-तेज़ चिल्लाने लगा। यह देखकर चींटी और तेज़-तेज़ काटने लगी। हाथी को बहुत दर्द हो रहा था। वह चिल्लाते-चिल्लाते रोने लगा। बचाओ-बचाओ की गुहार लगाने लगा।

यह सुनकर जंगल के बाक़ी सारे जानवर भी वहाँ आ गए। हाथी को ऐसे दुख में परेशान और रोता हुआ देखकर सब को बहुत ख़ुशी मिल रही थी। उसे बचाने उसके पास कोई नहीं आया। हाथी का दर्द बढ़ता ही जा रहा था। अंत में जब दर्द के मारे हाथी पसीना-पसीना हो गया और उसकी चीख कराह में बदल गयी। तब चीटी सूंड से बाहर निकली चींटी को देख हाथी थरथर काँप रहा था। बाक़ी सब उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। तब हाथी ने सिर झुकाकर चींटी समेत सभी से माफ़ी माँगी और चींटी से कहा मुझे माफ़ कर दो आज के बाद मैं तुम्हें या किसी भी जानवर को परेशान नहीं करूँगा।

आज मुझे समझ आ गया केवल बल से कुछ नहीं होता हैं। वही बड़ा होता है जिसकी बुद्धि बड़ी होती है। हाथी वहाँ से रफूचक्कर हो गया। फिर किसी को कभी परेशान नहीं किया।
चींटी बोली “अपने बल पर कभी घमंड मत करो बल्कि उसका उपयोग किसी अच्छे काम में करो।”
“कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता”

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