मन का कीचड़ – भगवान गौतम बुद्ध की Inspirational Story | हर जिम्मेदारी का हल मिलेगा

हर एक व्यक्ति का जीवन दुख, परेशानी और संघर्ष से घिरा हुआ है। क्या इसका समाधान है?

हर एक व्यक्ति के जीवन में ऐसा क्यूँ है? ऐसा इसलिए है क्यूँकि हम कहीं न कहीं अपने मन के मैल को, मन के कीचड़ को साफ नहीं रख पाते हैं। यूँ कहें तो उसका सही समाधान नहीं निकाल पाते हैं।

खैर चलिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं, शायद आपको इस कहानी से इस सवाल का हल मिल जाए।

गरीब किसान ज़िम्मेदारी से परेशान होकर किया परिवार का किया त्याग – प्रथम अध्याय

महात्मा गौतम बुद्ध के समय की बात है। एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता था। वह किसान बहुत ही ज्यादा परेशान रहता था। अपने दो बच्चों और पत्नी की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता था, शायद यही उसकी परेशानी की सबसे बड़ी वजह थी।

समय बीतता गया उसकी परेशानियां परिवार की जरूरतों के साथ बढ़ती ही जा रही थी। वह दिमाग से और मन से बहुत अशांत रहने लगा था। कहीं न कहीं वह बहुत ज्यादा दुखी हो गया था अपने परिवार की जरूरतों को नहीं पूरा कर पाने की वजह से।

एक दिन उसने यह फैसला लिया कि वह अपने घर को, अपने परिवार को, अपने बच्चों को छोड़कर कहीं दूर चला जाएगा।

अंततः वह मनहूस दिन और काली रात आ गई जिस दिन वह अपने परिवार को, अपने बच्चों को, अपनी पत्नी को छोड़कर घर से कहीं दूर चला गया।

किसान और गौतम बुद्ध का मिलाप – द्वितीय अध्याय

वह किसान चलता ही गया, चलता ही गया। रात से सुबह हो गई, सुबह से फिर दोपहर, दोपहर से शाम, शाम से फिर रात…, फिर सुबह हो गई।

उस किसान की मन की पीड़ा इतनी ज्यादा थी की उसके पैरों के छाले और पैरों से बह रहे खून के आगे फीके पड़ गए थे।

ना भूख की चिंता, ना प्यास की चाह, बस चलता ही गया, चलता ही गया। आखिरकार जंगल में चलते-चलते उसका शरीर इतना ज्यादा थक गया कि वह एक नदी के किनारे जाकर वह गिर पड़ा।

कुछ घंटों बाद उस किसान को होश आया। वह बेचारा इतना ज्यादा प्यासा था कि तुरंत वह नदी के पास गया। जैसे ही वह पानी पीने के लिए हाथ पानी में डाला, उसे सामने नदी के उस पार कुछ लोगों का झुंड दिखाई दिया। उसने ध्यान से देखा तो उसे एक वृक्ष के नीचे महात्मा गौतम बुद्ध बैठे हुए नजर आए।

वह तुरंत दौड़ के उनके पास गया और उनके पैर पर गिर कर बोला की हे महात्मा! हे भगवान गौतम बुद्ध! मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।

महात्मा गौतम बुद्ध के शरण में आया हुआ कोई भी व्यक्ति खाली हाथ वापस नहीं जाता, यह किसान तो केवल उनका शिष्य बनना चाहता था। महात्मा गौतम बुद्ध जी ने उसकी मनोदशा को देखते हुए उसे अपना शिष्य बना लिये।

किसान के ‘मन का कीचड़’ से मुक्ति – अन्तिम अध्याय

महात्मा गौतम बुद्ध और उनके शिष्य वहां पर केवल विश्राम कर रहे थे। उनका विश्राम भी पूरा हो चुका था। वह किसान भी अब महात्मा गौतम बुद्ध जी का शिष्य बन चुका था। अब समय हो चला था आगे की यात्रा को पूरा करने की।

गौतम बुद्ध और उनके शिष्य आगे बढ़ते चले गए कुछ दूर निकल जाने के बाद गौतम बुद्ध जी को बहुत जोर की प्यास लगी। उन्होंने अपने इस नए शिष्य अर्थात किसान से बोला कि प्रिय शिष्य जाओ पास में एक सरोवर है वहां से मेरे लिए पानी लेकर आओ।

किसान बोला – जो आज्ञा भगवान! किसान सरोवर की तरफ चल दिया। सरोवर के पास जैसे ही किसान पहुंचा, उसने देखा कि उस सरोवर में बहुत सारे जानवर उछल कूद कर रहे हैं।

वे सारे जीव-जंतु किसान को देखते ही तुरंत वहां से भाग गए। किसान बहुत ही खुश हुआ और उस सरोवर की तरफ चल दिया पानी लेने के लिए।

परन्तु जैसे ही किसान सरोवर के पानी के तरफ हाथ बढ़ाया उसने देखा कि पानी बहुत ही ज्यादा गंदा था। किसान निराश होकर वापस गौतम बुद्ध जी के पास आ गया।

गौतम बुद्ध जी ने उससे पूछा पानी कहाँ है? किसान ने दुखी भरे शब्दों के साथ कहा – हे भगवान! मैं जैसे ही उस सरोवर के पास पहुंचा, तो मैंने देखा की उस सरोवर में काफी सारे जीव जंतु उछल कूद कर रहे थे। और उनके उछल कूद करने की वजह से उस सरोवर के जमीन के तल मे बैठी हुई सारी गंदगी, सड़े हुए पत्ते उस पानी में घुल मिलकर एक कीचड़ का रूप ले लिए थे। यही कारण है कि मैं वह पानी लेकर नहीं आया क्योंकि वह पानी, पानी नहीं कीचड़ हो चुका था।

महात्मा गौतम बुद्ध जी उस किसान की बातों को समझ गए और मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा की मैंने तुमसे सरोवर का पानी मांगा था। मैंने यह नहीं कहा था कि पानी अगर गंदा हो तो पानी लेकर मत आना।

उन्होंने अपने दूसरे शिष्य से अनुग्रह किया की जाओ और सरोवर से पानी लेकर आओ। उनका दूसरा शिष्य निकल पड़ा पानी को लाने के लिए और कुछ देर पश्चात वह पानी लेकर वापस आ गया।

आश्चर्य की बात तो यह थी कि दूसरे शिष्य द्वारा लाया हुआ पानी बिल्कुल साफ था। और उससे भी बड़ी असमंजस की बात यह थी कि सारे के सारे शिष्य बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए, की यह करिश्मा कैसे हो सकता है। क्यूँकि पहले शिष्य ने तो यह बताया था कि पानी कीचड़ हो गया था।

महात्मा गौतम बुद्ध जी ने सारे शिष्यों को यह बताया कि जब सारे जीव जंतु उस पानी में उछल कूद कर रहे थे, तब उस दौरान उस सरोवर के पानी के तल में बैठी हुई सारी गंदगी सड़े गले हुए पत्ते सब घुल मिलकर कीचड़ रूपी पानी का रूप ले लिए थे।

परन्तु जितने समय मे ‘प्रथम शिष्य (किसान)’ वापस आया और दूसरा शिष्य वापस गया उतने समय मे उन जीव जंतुओं के भाग जाने के पश्चात उस सरोवर का पानी धीरे-धीरे शांत हो गया था।

और जैसे-जैसे सरोवर का पानी शांत होता गया, उस सरोवर के कीचड़ रूपी पानी में खुली हुई सारी सड़ी गली पत्तियां और मिट्टी धीरे-धीरे शांत होकर उस सरोवर के तल में जाकर बैठ गए। जिससे उस सरोवर का पानी शांत होकर साफ हो गया। तथा सारे गले हुए सड़े हुए पत्तियां भी शांत होकर आराम से उस सरोवर के तल में जाकर बैठ गए थे।

प्रिय शिष्यों अगर उस सरोवर में किसी भी तरीके का कोई हलचल नहीं होता तो उस सरोवर की हर एक चीज जिसको जहां पर होनी चाहिए थी वह वहीं पर ही रहती। उन जीव जंतुओं के हलचल की वजह से सरोवर के तल में बैठी हुई सड़ी गली पत्तियां मिट्टी, उस शांत पानी में मिलकर एक कीचड़ का रूप ले लिए थे।

ठीक इसी प्रकार से हर एक व्यक्ति के जीवन में तरह तरह की समस्याएं परेशानियां और कठिनाइयां आती है। जिसके वजह से हमारे मन में हलचल सी मच जाती है। हमारा दिमाग और मन अशांत हो जाता है। तत्पश्चात हम कोई गलत निर्णय अर्थात फैसला ले लेते हैं।

परंतु अगर हम थोड़ा समय देकर उन कठिनाइयों, परेशानियों और समस्याओं के बारे में समझने की कोशिश करें तो मन की हलचल उस सरोवर की पानी की तरह शांत हो जाएगी। जिससे हम अपने जीवन में सही निर्णय का चुनाव करते हुए उसका समाधान निकाल लेंगे।

किसान को महात्मा गौतम बुद्ध जी की सारी बातें बिल्कुल साफ-साफ समझ में आ गई। उसे यह भी समझ में आ गया कि उसके परिवार में आई हुई सारी परेशानियां, दिक्कतें और जिम्मेदारियां भी इसी सरोवर के सड़ी गली हुई पत्तियों और मिट्टी रूपी कीचड़ की तरह ही हैं। बस जरूरत है थोड़ा समय निकालकर मन को शांत करते हुए उन परेशानियों दिक्कतों के बारे में समझने और उसका समाधान निकालने की।

‘मन का कीचड़’ कहानी से हमने क्या सीखा ?

दोस्तों समय के साथ-साथ हर एक इंसान की जरूरतें बढ़ती ही जाती है। हो सकता है किसी की जरूरत कम हो, हो सकता है किसी की जरूरत ज्यादा हो, लेकिन हमें उन जरूरतों को पूरा करने के लिए मेहनत तो करना ही पड़ता है। हां यह जरूर है कि मेहनत करते वक्त हमें बहुत सारे कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी वजह से बहुत बार हमारा मन अशांत हो जाता है, निराश हो जाता है, दिल-दिमाग मे एक अजीब सी हलचल होने लगती है। जिसके वजह से हम गलत फैसला ले लेते हैं।

परंतु दोस्तों हमें घबराने की जरूरत नहीं है हमें अपने दिमाग को शांत करने की जरूरत है। थोड़ा समय देकर इसके बारे में सोचने की जरूरत है। इसका समाधान कुछ न कुछ जरूर निकल आएगा।

दिमाग को शांत रखें, कोशिश करते रहें, मेहनत करते रहें, समय लगेगा लेकिन सफलता जरूर मिलेगी !
क्यूँकि सब्र का फल मीठा होता है।

धन्यवाद!

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