रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल और त्याग से बनते हैं।
अंकित अपने मित्र जितेंद्र के पास घबराया हुआ आता है और कहता है,
“मित्र जितेंद्र, मेरी माँ की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब है। इलाज के लिए कुछ पैसों की ज़रूरत है, क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?”
जितेंद्र दुखी मन से उत्तर देता है,
“मित्र अंकित, इस समय मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैं चाहकर भी तुम्हारी मदद नहीं कर सकता।”
उसी समय पास ही एक बाइक आकर रुकती है। उस पर आर्यन नाम का एक युवक बैठा होता है। वह जितेंद्र को आवाज़ देकर बुलाता है।
तब जितेंद्र अंकित से कहता है,
“वह देखो, तुम्हारा सौतेला भाई आर्यन। तुम उससे क्यों नहीं मदद माँग लेते?”
अंकित गुस्से में कहता है,
“वह मेरा सौतेला भाई है, वह मेरी कभी मदद नहीं करेगा।”
इतना कहकर अंकित वहीं खड़ा रह जाता है और जितेंद्र दौड़कर आर्यन के पास जाता है। वह आर्यन से कहता है,
“भाई आर्यन, तुम्हारे सौतेले भाई अंकित की माँ की हालत बहुत गंभीर है। अगर तुम मदद कर सको तो उसकी जान बच सकती है।”
आर्यन शांत स्वर में कहता है,
“भाई, फिलहाल मेरे पास नकद पैसे तो नहीं हैं।”
यह सुनकर अंकित क्रोधित हो जाता है और मन ही मन सोचता है कि उसका सौतेला भाई उसकी मदद नहीं करेगा। गुस्से में वह वहाँ से चला जाता है।
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कुछ दिन बाद अंकित बहुत खुश होकर जितेंद्र के घर आता है।
जितेंद्र पूछता है,
“क्या बात है अंकित, आज तो तुम बहुत खुश लग रहे हो?”
अंकित मुस्कुराते हुए कहता है,
“हाँ मित्र, मेरी माँ अब ठीक हो गई हैं। उनका ऑपरेशन सफल रहा।”
उसी समय अंकित की नज़र अपने सौतेले भाई आर्यन पर पड़ती है, जो उदास मन से पैदल जा रहा होता है।
अंकित हैरानी और व्यंग्य के साथ कहता है,
“अरे, जो आदमी हमेशा बाइक पर घूमता था, आज वह पैदल क्यों चल रहा है?”
जितेंद्र गंभीर स्वर में कहता है,
“अंकित, आर्यन की फैक्ट्री में आग लग गई। उसकी बाइक भी चोरी हो गई है।”
यह सुनकर अंकित हँसते हुए कहता है,
“बहुत अच्छा हुआ! ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। मैं तो चाहता हूँ कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए।”
तभी जितेंद्र गुस्से में कहता है,
“अंकित, अब एक शब्द भी मत बोलो! तुम्हारी माँ का इलाज जिस पैसों से हुआ, वह किसी और ने नहीं, बल्कि तुम्हारे उसी सौतेले भाई आर्यन ने किया है।”
अंकित स्तब्ध रह जाता है।
जितेंद्र आगे कहता है,
“आर्यन ने अपनी बाइक बेच दी, अपनी फैक्ट्री तक बेच दी और सारा पैसा अस्पताल में जमा कराया। डॉक्टर से भी कहा कि अंकित को यह बात मत बताना, नहीं तो वह नाराज़ हो जाएगा।”
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यह सुनते ही अंकित की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। उसका सिर शर्म से झुक जाता है।
वह दौड़कर अपने सौतेले भाई आर्यन के पास जाता है, उसके पैरों में गिरकर रोते हुए कहता है,
“भैया, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें कभी अपना नहीं माना, लेकिन तुमने सच्चे भाई होने का फ़र्ज़ निभाया।”
आर्यन अंकित को उठाकर गले लगा लेता है।
उस दिन अंकित समझ गया कि
रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल और त्याग से बनते हैं।
