वक्त सबका बदलता है

ये कहानी रोहन नाम के लड़के की है जिसकी माँ बचपन में ही गुजर गई थी। तब से अकेले उसके पिता बलवंत एक लोहे के कारख़ाने में काम कर उसका भरण पोषण करते थे।

धीरे धीरे समय बीतता गया अब रोहन स्कूल जाने लगा था। वह हर सुबह जल्दी उठ कर चूल्हे पर सुबह का खाना पकाता, खाना खा कर दोनों बाप बेटे एक साथ निकलते थे। रोहन अपने स्कूल चला जाता था और बलवंत अपने कारख़ाने चला जाता था।

रोहन अपनी उम्र के बच्चों के मुक़ाबले अधिक समझदार था। वह पढ़ाई में भी बहुत अच्छा था। वह हर वर्ष अपनी कक्षा में प्रथम आता था।

दोपहर को घर आकर पूरे दिन वह पढ़ाई करता था फिर शाम को बलवंत के आने से पहले खाना पका देता था। वह जनता था कि उसके पिता पूरे दिन मज़दूरी कर थक जाते है घर आकर उनको खाना न पकाना पड़े इसलिए वह हर दिन उसके आने से पहले ही खाना पका देता था।

बलवंत के घर आने के बाद दोनों एक साथ खाना खा कर सो जाते थे। बलवंत रोहन को डॉक्टर बनाना चाहता था। वह दिन रात जी तोड़ मेहनत कर एक एक पाई जोड़ रहा था।

उसकी पढ़ाई की हर ज़रूरतों को समय से पूरी करने की कोशिशों में लगा रहता था। रोहन भी बहुत मेहनती था वह भी अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करता था जिसका परिणाम उसके अच्छे अंकों के माध्यम से दिख रहा था।

सब कुछ ठीक चल रहा था दोनों बहुत खुश थे लेकिन एक दिन उनकी ख़ुशियों में ग्रहण लग गया। कारख़ाने में काम करते वक्त बलवंत के दोनों हाथों पर लोहे का बड़ा बंडल उसके दोनों हाथों पर गिर गया जिसकी वजह से उसके दोनों हाथ बुरी तरह कुचल गए।

कई महीनों के इलाज के बाद वह ठीक तो हो गया लेकिन डॉक्टर को उसके दोनों हाथ काटने पड़े थे। छः महीने बाद वह अस्पताल से छूट कर घर आया। वह अपने दोनों हाथ गवा चुका था।

घर आकर वह बहुत दुःखी था। उसका सपना चूर चूर हो चुका था। वह मन ही मन भगवान से बोला- हे भगवान तुमने यह क्या किया? पहले रोहन की माँ को छीन लिया और अब मेरे दोनों हाथ।

मेरे इस बच्चे का क्या होगा? इसका भविष्य तो चौपट हो गया। अब यह डॉक्टर कैसे बनेगा। पढ़ाई में इतना होशियार होने के बावजूद भी यह आगे की पढ़ाई कैसे करेगा?

यही सब बातें सोच सोच कर बलवंत रो रहा था कि तभी रोहन वहाँ आया और बोला- बापू, तुम चिंता मत करो मैं अब बड़ा हो गया हूँ मैं काम करने के साथ साथ पढ़ाई कर एक दिन डॉक्टर बन कर तुम्हारा सपना अवश्य पूरा करूँगा।

उस दिन के बाद से रोहन सुबह खाना पका कर अपने बापू को खिला कर स्कूल जाता था और दोपहर को घर आने के बाद घर घर घूमकर एक कंपनी का साबुन बेचता था।

जिससे उसकी जितनी आमदनी होती उसी में वह घर का खर्च और पढ़ाई का खर्च पूरा करता था। वह पूरी रात पढ़ाई करता रहता था। रविवार के दिन वह पूरे दिन घूम घूम कर साबुन बेचा करता था जिससे अधिक पैसे कमा सके।

अब वह बारहवीं प्रथम स्थान प्राप्त कर पास हो चुका था। आज डॉक्टर की पढ़ाई करने के फॉर्म का अंतिम दिन था, जिसके लिये पाँच सौ रुपये की ज़रूरत थी।

लेकिन उसके पास मात्र दो सौ रुपये ही थे। उसे और रुपयों की ज़रूरत थी लेकिन ऐसा लग रहा था भगवान उसकी और परीक्षा लेने के इरादे में थे।

बदक़िस्मती से उस दिन उसका एक भी साबुन नहीं बिका। वह बहुत परेशान था। एडिया घिसने के बावजूद भी उसका एक भी साबुन नहीं बिका। अंधेरा होने को था अब वह पूरी तरह निराश हो चुका था उसे बहुत तेज भूख और प्यास लगी थी।

वह मन ही मन सोचा लगता है इस साल वह फॉर्म नहीं भर पाएगा। भूख प्यास से बदहाल रोहन एक घर साबुन बेचने पहुँचा जहां उसने सोचा कि यदि यहाँ साबुन बिका तो वह पैसों के बदले इनसे कुछ खाने के लिए माँगेगा।

दरवाज़ा खटखटाया अंदर से एक महिला निकली उसे देख रोहन उसे साबुन दिखाते हुए बोला- माँ जी, मैं यह साबुन बेचने आया हूँ, यदि आपको आवश्यकता हो तो ले लीजिए।

लेकिन उससे पहले कृपा कर मुझे एक गिलास पानी पिला दीजिए मैं बहुत प्यासा हूँ। महिला ने उसे उपर से नीचे तक देखा वह समझ गई कि यह लड़का बहुत भूखा भी है वह अंदर गई और खाने के लिए दो रोटी और साथ में पानी लाई। रोहन से बोली- बेटा तुम बहुत भूखे भी लग रहे हो ख़ाली पेट पानी पियोगे तो नुक़सान करेगा इसलिए पहले रोटियाँ खा लो फिर पानी पीना।

रोहन उनको धन्यवाद बोल कर खाने लगा। इसी बीच महिला बोली- क्या तुम पढ़ाई नहीं करते? रोहन बोला- करता हूँ माँ जी मैंने बारहवीं पास कर ली है। आगे डॉक्टर की पढ़ाई करना चाहता हूँ लेकिन लग रहा है इस साल नहीं कर पाऊँगा क्योकि फॉर्म भरने के लिए मुझे पाँच सौ रुपयों की आवश्यकता है लेकिन आज एक भी साबुन नहीं बिका इसलिए पैसे नहीं है कि फॉर्म भरूँ।

वह महिला घर में गई और पाँच सौ रुपये लाकर रोहन को दे दी और बोली- ये लो बेटा जाओ पहले अपना फॉर्म भर लो। रोहन की आँखें चमक उठी वह उनके पैर छू कर वहाँ से भागा और सबसे पहले फॉर्म भरा। घर जा कर सारी घटना अपने बापू से बताया। उसका बाबू भगवान को धन्यवाद दिया और बोला- बेटा अच्छे से मन लगाकर पढ़ाई करना।

परीक्षा का परिणाम आया रोहन उस परीक्षा में भी प्रथम आया था। उसे सरकारी कॉलेज में दाख़िला मिल गया। दोनों बाप बेटे बहुत खुश थे।

वह पढ़ाई कर एक बहुत बड़ा डॉक्टर बन गया था। कुछ ही सालों में उसने अपने शहर में ही अपना अस्पताल भी खोल दिया था। जिसमे बहुत अच्छा इलाज होता था। देखते ही देखते रोहन पूरे शहर में मशहूर हो गया।

एक दिन कुछ लोग एक अधेड़ महिला को उसके अस्पताल लाए। दुनिया में उस महिला का कोई नहीं था। उसे टीवी हो गई थी जाँच में पता चला कि वह टीवी के अंतिम चरण में आ चुकी है।

यह सारी बात रोहन के सहयोगी डॉक्टर ने उसे बताया। रोहन तुरंत बोला- उस महिला को फ़ौरन अस्पताल में भर्ती करो। सहयोगी बोला- लेकिन उस महिला के साथ कोई नहीं है उसके इलाज के पैसे कौन देगा?

रोहन बोला- तुम इसकी चिंता मत करो मुझे उसके पास ले चलो। रोहन उसके पास गया तो देखा कि वह वही महिला थी जो वर्षों पहले उसे फॉर्म भरने के लिए पैसे दी थी। रोहन उसे तुरंत पहचान गया। बिना किसी को बताये वह इलाज प्रारंभ कर दिया।

दिन रात उसके इलाज के साथ साथ उसकी सेवा भी करता था। धीरे धीरे वह महिला ठीक होने लगी। तीन महीनों के इलाज के बाद अब वह पूरी तरह स्वस्थ्य हो चुकी थी।

उसकी छुट्टी का दिन आया एक नर्श उस महिला के कमरे में आई और बोली- माँ जी अब आप घर जा सकती है, उसे एक लिफाफा देते हुए बोली- यह रहा आपके इलाज का खर्च का बिल। इतना कह कर वह चली गई।

वह महिला बहुत परेशान हुई सोची मैं ठीक तो हो गई लेकिन इसका बिल कैसे चुकाऊँगी? डरते डरते वह लिफ़ाफ़ा खोली जिसमे से एक चिट्ठी निकली। उस चिट्ठी में लिखा था ” माँ जी अब आप बिलकुल स्वस्थ है, आपने सालों पहले ही अपने इलाज के पैसे दे दिये थे। मैं वही लड़का हूँ जो साबुन बेचने आपके घर गया था जिसका फॉर्म भरने के पैसे आपने दिये थे” उसके तुरंत बाद रोहन अंदर आ गया और उस महिला के पैर छूते हुए बोला- माँ जी मैं वही लड़का हूँ जो आपकी मदद करने की वजह से आज सौभाग्य साली डॉक्टर हूँ जिसे आपका इलाज करने का मौक़ा मिला।

रोहन की बातें सुनकर महिला की आँखों में आंसू आ गए। रोहन उससे एक और आग्रह किया कि- मैं पता किया तो मुझे पता चला कि इस दुनिया में आप अकेली है इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप मेरे घर में मेरे साथ माँ बन कर रहे। वह महिला खुशी के मारे रो पड़ी। अब वह रोहन के साथ उसके घर में रहने लगी।

🌿 कहानी की सीख

  • बुरा वक्त गुजर जाता है बस इंसान को धैर्य रखना चाहिए
  • लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रयाप्त मेहनत करना चाहिए।

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