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शरारती गिलहरी की कहानी

एक जंगल में चुनचुन नाम की गिलहरी अपनी माँ गिट्टू के साथ रहती थी। चुनचुन बहुत शरारती थी। वह अपनी माँ की बात नहीं सुनती थी। चुनचुन की हरकतों से जंगल के सभी जानवर परेशान रहते थे। वो हमेशा सबको परेशान करती रहती थी।

शरारती गिलहरी

एक दिन चुनचुन पेड़ पर खेल रही थी। उसी पेड़ पर फ़र्राटा नाम का बंदर सो रहा था। फ़र्राटा को सोता देख चुनचुन किट्टू के पास गई। और बोली माँ देखो हमारे पेड़ पर बंदर सो रहा है। जंगल में हज़ारों पेड़ हैं, उससे कहो किसी और पेड़ पर जाकर सोए। ये हमारा पेड़ है। इस पर केवल हम ही रह सकते हैं। उसकी बात पर किट्टू बोली – चुनचुन तुमसे ये किसने कहा ये पेड़ हमारा है? जैसे ये जंगल सबका है वैसे ही यहाँ के सारे पेड़ भी सबके हैं। तुम किसी को पेड़ पर आने-जाने से नहीं रोक सकती है।

किट्टू यह कह कर चली गई। लेकिन चुनचुन को एक शरारत सूझी, वह फ़र्राटा के पास गई और उसकी पूँछ टहनी से बांध दी। थोड़ी देर बाद जब फ़र्राटा की नींद खुली वह दूसरी टहनी पर जाने के लिए छलांग लगाया, लेकिन पूँछ बंधी होने के कारण वह दूसरी टहनी पर नहीं जा सका। और पेड़ पर ही उल्टा लटक गया। फ़र्राटा चिल्लाने लगा बचाओ-बचाओ फ़र्राटा की चीख सुनकर वहाँ जंगल के सभी जानवर आ गये। जिसमें जंगल का राजा शेर सिंह भी था।

शेर सिंह ने फ़र्राटा से पूछा, फ़र्राटा तुम पेड़ पर उल्टा कैसे लटक गए? फ़र्राटा रोते-रोते बोला महाराज किसी ने मेरी पूँछ पेड़ से बाँध दी और मैं छलांग लगाने में यहीं लटक गया। यह सुनकर हाथी ही बोला लेकिन तुम्हारी पूँछ कोई क्यों बाधेंगा? किसी को ऐसा करके क्या मिलेगा? तभी वहाँ मौजूद हिरन बोला यह काम पक्का उस शरारती चुनचुन का होगा। वही ऐसा काम कर सकती है।क्योंकि वही जंगल के सभी जानवरों को परेशान करती रहती है। यह सारी बातें किट्टू और चुनचुन पेड़ पर बैठे सुन रहे थे।

तभी चुनचुन बोली हाँ मैंने ही बंदर की पूँछ पेड़ से बाँधी थी। हाथी चुनचुन से पूछा लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया? बंदर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? चुनचुन बोली जंगल में इतने सारे पेड़ है, ये बंदर इस पेड़ पर क्यों सोया था? ये पेड़ हमारा है इस पर कोई नहीं आ सकता। चुनचुन की बात सुनकर सभी हैरान रह गए। भालू बोला चुनचुन एक बात कान खोलकर सुन लो यह जंगल सबका है। और यहाँ के पेड़ों पर सबका अधिकार है। तभी राजा शेर सिंह चेतावनी देते हुए बोला चुनचुन अगर आगे से तुमने जंगल के किसी जानवर को परेशान किया तो, मैं तुम्हें और तुम्हारी माँ दोनों को जंगल से बाहर निकाल दूँगा।

यह सुनते ही गिट्टू घबरा गई, और बोली महाराज चुनचुन अभी छोटी बच्ची है, नादान है। मैं इसे समझा दूंगी आगे से यह ऐसा कोई काम नहीं करेगी। कृपा करके इसे माफ़ कर दीजिए। मैं अभी फ़र्राटा की पूँछ खोल देती हूँ। यह कह कर किट्टू जल्दी से फ़र्राटा के पास गई और उसकी पूँछ खोलने लगी। पूँछ खुलते ही फ़र्राटा धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा। उसे देख चुनचुन को बहुत मज़ा आया। वह तेज़ तेज़ हँसने लगी। चुनचुन को हसता देख शेर को ग़ुस्सा आ गया। और गिट्टू से बोला गिट्टू समझा देना अपनी बेटी को यह इसके लिए आख़िरी चेतावनी है।

यह बोलकर शेर सिंह और बाक़ी सभी जानवर वहाँ से चले गए। सबके जाने के बाद किट्टू चुनचुन को समझाते हुए कहती है तुम ये सब शरारतें करना बंद कर दो बेटी नहीं तो किसी दिन मुसीबत में पड़ जाओगी। गिट्टू की इस बात का चुनचुन पर कोई असर नहीं हुआ।
कुछ दिनों बाद गिट्टू को किसी काम से जंगल के बाहर जाना था। वह चुनचुन से बोली बेटी मुझे किसी ज़रूरी काम से जंगल के बाहर जाना है। लेकिन तुम यहाँ किसी को परेशान मत करना। इस जंगल से बाहर मत जाना। मैं जल्द ही वापस आ जाऊँगी। चुनचुन हाँ में सर हिलाई और बोली माँ आप चिंता मत करिए मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी।

लेकिन गिट्टू को उसकी बात पर विश्वास नहीं था। इसलिए अपने पड़ोसी कालु कौवे के पास गई। और बोली कालु भाई मुझे ज़रूरी काम से जंगल के बाहर जाना पड़ रहा है। मैं एक दो दिन में वापस आ जाऊँगी। तब तक आप चुनचुन का ध्यान रख लेना। कालु बोला ठीक है, लेकिन तुम जल्द ही वापस आ जाना क्योंकि तुम्हारी बेटी चुनचुन का ज्यादा दिन तक देखभाल करना मेरे बस की बात नहीं है। कालु भाई बिलकुल चिंता मत करो मैं जल्द ही वापस आ जाऊँगी। यह कहकर किट्टू चली गयी चुनचुन वहीं जंगल में रहने लगी।

एक दिन चुनचुन अकेली पेड़ पर बैठे बैठे सोच रही थी। आज माँ को गए कई दिन हो गया है। मैं भी जंगल के बाहर जाकर माँ से मिलती हूँ माँ मुझे देखकर ख़ुश हो जाएगी। इतना सोचकर वह पेड़ से नीचे उतरने लगी, उसे उतरता देख कालू ने पूछा चुनचुन कहाँ जा रही हो? चुनचुन बोली कालु काका मैं पानी पीने जा रही हूँ। कालु से वह झूठ बोलकर नीचे उतरने लगी। तभी कालु काका बोले देखो अंधेरा होने वाला है तुम जल्दी वापस आ जाना। चुनचुन जंगल से बाहर जाते समय रास्ता भूल गई। अब उसे जंगल का कोई जानवर दिखाई नहीं दे रहा था। जिससे वह रास्ता पूछती वह इधर उधर भटकने लगी।

उधर उसकी माँ पेड़ पर आ गई। उसे चुनचुन कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। वह कालु से पूछी, कालु भाई चुनचुन दिखाई नहीं दे रही है। कहाँ गई है? कालु ने बताया मुझसे पानी पीने के लिए बोल कर गयी है। बहुत देर हो गई वापस नहीं आयी। गिट्टू परेशान हो गयी। और कालू के साथ उसे ढूंढने निकल पड़ी। रास्ते में उसे जंगल के सभी जानवर मिले वह सबसे चुनचुन के खो जाने की बात बतायी। तभी मिट्ठू तोते को आसमान में एक गिद्ध मंडराता हुआ दिखाई दिया। वह बोला वह देखो गिद्ध मड़रा रहा है। इतनी शाम को गिद्ध क्यों मड़रा रहा है? कही उसकी नज़र चुनचुन पर तो नहीं पड़ गई? इतना कहकर मिट्ठू और कालू दोनो उड़कर वहाँ देखने पहुँचे।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि नीचे चुनचुन ही है, और ये गिद्ध चुनचुन के ऊपर मड़रा रहा है। तभी मौक़ा मिलते ही गिद्ध चुनचुन को अपने पंजों में दबोच लिया और उड़ गया। यह देख कालु और मिट्ठू हवा में ही गिद्ध से लड़ने लगे। लड़ाई के दौरान जैसे ही मिट्ठू ने अपनी मज़बूत चोंच से गिद्ध की पीठ पर मारा वैसे ही चुनचुन उसके चंगुल से छूट गई। और नीचे गिरने लगी। उसे नीचे गिरता देख बंदर झट से कूड़ा और पेड़ से छलांग लगाकर चुनचुन को पकड़ लिया।

जैसे तैसे उसकी जान बची घबरायी हुई उसकी माँ उसे गले लगा ली, और उससे पूछा तुम ठीक तो हो न चुनचुन? चुनचुन बोली हाँ माँ मैं बिलकुल ठीक हूँ । शेर सिंह चुनचुन से बोला हम सब इसीलिए तुमको समझाते थे। शरारत मत किया करो, देखो कितनी बड़ी मुसीबत में पड़ गई थी। यह सुनकर चुनचुन माँ से बोली माँ मुझे माफ़ कर दो आज के बाद में कभी कोई शरारत नहीं करूँगी। उसने हाथ जोड़कर सब से माफ़ी माँगी और बचाने के लिए धन्यवाद कहा।

अब वह सबके के साथ हँसी-ख़ुशी, मिल-जुल कर रहने लगी। किसी को कभी परेशान नहीं करती थी।
हमेशा अपने बड़ों की बात सुनो और मानो

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