
एक गाँव में बलवीर नाम का किसान रहता था। वह अपने काम के प्रति बहुत ईमानदार और बहुत मेहनती था।
वह कद्दू (kaddu) की खेती करता था। वह रोज़ शाम को खेत से कद्दू तोड़ता था और अपनी बैलगाड़ी पर रख कर गाँव- गाँव शहर- शहर में घूम घूम कर बेचता था।
उसका काम अच्छा चल रहा था। वह कद्दू उगाने के लिए जैविक खादों का प्रयोग करता था। इसलिए लोगो में उसका नाम अच्छा था।
एक दिन उसके पास एक आदमी आया जिसका नाम नारद था। नारद उससे बोला- बलवीर, तुम दिन रात मेहनत करते हो और
अपने कद्दू बैलगाड़ी पर रख कर दिन रात घूम घूम कर बेचते हो और मन मुताबिक़ दाम में बेच भी नहीं पाते।
मेरे पास तुम्हारी इस समस्या का हल है। तुम अपने कद्दू मेरे साहब को बेच दिया करो उसके लिए तुम्हें उन्हें बैलगाड़ी में भरकर यहाँ वहाँ घुमाना नहीं पड़ेगा।
साहब की गाड़ी आएगी और तुम्हारे खेत से ही कद्दू उठाकर ले जाएगी और जीतने दाम में तुम उन्हें बेचते हो उससे अधिक क़ीमत भी मिल जाएगी, फिर क्यों इतनी मेहनत करनी है।
बलवीर बड़े सरल शब्दों में बोला- नारद, मैं किसान हूँ जो दिन रात मेहनत कर सकता है बिना मेहनत के कोई काम नहीं होता है।
और रही बात पैसों की तो मुझे पैसों का लालच नहीं है मैं अपनी सब्ज़ियो को जानबूझ कर कम दामों में बेचता हूँ जिससे सभी शुद्ध सब्ज़ी खा सके और स्वस्थ रह सके।
अगर यही कद्दू मैं तुम्हारे साहब को बेच दूँगा तो वह उन्हें और महँगे दामो में बेचेंगे जिससे आम इंसान को दिक़्क़त होगी।
उन्हें अच्छी चीजों के लिए ज़रूरत से अधिक धन खर्च करना पड़ेगा। जो मैं बिलकुल नहीं होने दूँगा। तुम यहाँ से चले जाओ।
अगले दिन हर रोज़ की तरह बलवीर आज शाम अपनी बैलगाड़ी पर कद्दू भर कर उन्हें बेचने चल दिया।
वह कद्दू बेचते बेचते बहुत दूर गाँव में निकल गया। सूरज भी ढलने को था।
शाम होते देख बलवीर सोचा अगर वह घर के लिए निकलेगा तो उसे रात हो जाएगी और बैल भी पूरे दिन चलकर थक गए होंगे।
इसलिए वह वही रुकने के लिए कोई जगह ढूढ़ने लगा। वह एक घर के पास गया। वह घर बहुत आलीशान और सुंदर था।
वहाँ उसे एक आदमी दिखा जो पहनावे से बहुत अमीर लग रहा था।
बलवीर उसके पास गया और बोला- भाई, मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है जहां जाने में रात हो जाएगी मेरे बैल भी बहुत थक चुके है
तो क्या आज रात मैं आपके घर के बाहर रुक सकता हूँ? सुबह होते ही मैं यहाँ से चला जाऊँगा।
वह आदमी जिसका नाम धनुसेठ था बोला- हाँ भाई तुम अवश्य मेरे घर रुक सकते हो।
बलवीर उसे धन्यवाद बोल कर बैलगाड़ी पर रखे सभी कद्दुओं को उतार कर बाहर बरामदे में रख दिया और बैलों को चारा डाल दिया।
धनुसेठ और बलवीर दोनों बैठ कर बातें करने लगे। बलवीर बोला- दुनिया में आप जैसे कम लोग है जो अनजान लोगो की मदद करते है आप बहुत अच्छे इंसान है।
आप जैसे लोगो की वजह से आज इंसानियत ज़िंदा है। दोनों बातें करते करते भोजन किए।
धनुसेठ बोला- अब बहुत रात हो गई है तुम आराम करो तुम्हें कल सुबह जल्दी निकलना है। बलवीर को आँगन में सुलाकर धनुसेठ अपने कमरे में जाकर सो गया।
सुबह हुई बलवीर उठा हाथ मुँह धो कर वह अपने कद्दुओं को बैलगाड़ी में रखने गया।
वहाँ जाकर वह हैरान रह गया। जीतने कद्दू उसने रखे थे उसके आधे से भी कम कद्दू वहाँ बचे थे।
वह धनुसेठ के पास गया और उनसे कद्दू के बारे पूछा और बोला- मेरे आधे से अधिक कद्दू यहाँ से ग़ायब है क्या आप जानते है?
उसकी बातें सुन धनुसेठ को ग़ुस्सा आ गया वह ग़ुस्से में बोला- मुझे क्या पता तुम्हारे कद्दू कहा है।
मैं तो तुम्हारे सामने ही अपने कमरें में जाकर सो गया था। तुम्हारे कद्दू कौन चुरायेगा? ध्यान से सोचो इतने ही रहे होंगे।
बलवीर को धनुसेठ का बर्ताव बड़ा अजीब लगा अब उसे उस पर शक होने लगा।
वह बोला- मुझे खूब अच्छे से याद है कि मेरे कद्दू बहुत अधिक थे और अब बहुत कम है।
अगर आपको उनके बारे में पता हो तो कृपा कर उन्हें वापस कर दीजिए।
धनुसेठ को और ग़ुस्सा आया और वह बिदक कर बोला- तुम्हें रात में पनाह देना ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।
अच्छे से तुम्हारी ख़ातिरदारी भी किया और अब तुम मुझ पर ही उल्टा इल्ज़ाम लगा रहे हो,
निकल जाओ मेरे घर से वरना अपने आदमियों को बुला कर तुम्हारी टाँग तुड़वा दूँगा।
तभी बलवीर की नज़र एक आदमी पर पड़ी, यह वही आदमी था जो कल बलवीर के पास व्यापार की बात करने आया था। बलवीर सब समझ गया और वहाँ से निकल गया।
वहाँ से निकल वह सीधे वहाँ के ग्राम प्रधान के पास गया। जिनकी बुद्धिमानी की चर्चा हर तरफ़ थी।
बलवीर उनसे पूरी बात बताया और प्रधान जी से बताया कि वह वहाँ नारद को भी देखा है उसे शक है कि यह चोरी सेठ ने कराई है।
प्रधान बहुत सुलझा हुआ व्यक्ति था। वह थोड़ी देर सोचा और अपने आदमियों से कुछ बात कर धनुसेठ को बुलाने के लिए कहा।
धनुसेठ आया और प्रधान जी के पूछने पर बोला- प्रधान जी आज की दुनिया में नेकी करना मतलब अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारना बाराबर है।
मैं इस आदमी की अच्छी ख़ातिरदारी किया और यह मुझ पर चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगा रहा है।
मेरे पास कद्दुओं का भंडार है भला मैं क्यों इसके कद्दू चुराऊँगा?
उसकी बात सुनकर प्रधान जी उससे उसके कद्दू लाने को बोले। धनुसेठ अपने घर से एक बड़ा सा कद्दू ले आया।
उसके बाद प्रधान जी अपने एक आदमी की तरफ़ इशारा कर बोले- यह सलेंद्र है इसे सब्ज़ीओ और फलों की बहुत अच्छी पहचान है।
यह इन दोनों कद्दुओं की पहचान कर बताएगा कि कौन झूठ बोल रहा है।
सलेंद्र आगे आया दोनों कद्दुओं की ठीक से निगरानी करने के बाद बोला- प्रधान जी यह दोनों कद्दू बिलकुल एक जैसे लग रहे है इनमें देख कर अंतर कर पाना बड़ा मुश्किल है।
अब मैं इन्हें चख कर ही कुछ बता पाऊँगा। वह सेठ के कद्दू को काटकर एक टुकड़ा निकाला और उन्हें खाया।
कद्दू खाते ही सैलेंद्र अपना गला पकड़ कर चिल्लाने लगा और बोला इस कद्दू में ज़हर मिला हुआ है।
उसे देखकर धनुसेठ बिलकुल घबरा गया उसके पसीने छूटने लगे। प्रधान जी उसे अकेले में ले गये और बोले- यह तुमने क्या किया?
ज़हरीला कद्दू खिलाकर मेरे आदमी को मार डाला अब तो तुम्हें सज़ा होगी मैं फ़ौरन पुलिस को बुलाने जा रहा हूँ।
धनुसेठ बहुत डर गया। वह प्रधान जी से बोला- प्रधान जी यह ज़हरीले कद्दू मेरे नहीं है, बल्कि बलवीर के है मैं उसके बहुत सारे कद्दू चुरा लिया था।
सजा मुझे नहीं बल्कि बलवीर को मिलनी चाहिए।
उसकी बातें सुन प्रधान हंसते हुए बोला- उस कद्दू में कोई ज़हर नहीं था तुम्हारा सच जानने के लिए मैं चाल चला था।
तभी सैलेंद्र और बलवीर उसके पास आ गये। सेठ बहुत लज्जित हुआ और प्रधान के आदेशानुसार बलवीर के सारे कद्दू लौटा दिये। प्रधान जी पुलिस बुला कर धनुसेठ को जेल भेज दिये। बलवीर प्रधान जी को धन्यवाद देकर ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया।
कहानी की सीख- अपने फ़ायदे के लिए कभी किसी के साथ विश्वास घात नहीं करना चाहिए।